हिंदी कवयित्री Greater Noida · since ’16
🍂 वैराग्यं परमं सुखं 🥀
/ काव्य-संग्रह
सात रचनाएँ — प्रेम से विरह तक, और उस प्रश्न तक जो हर कवि खुद से पूछता है: कौन हूँ मैं? किसी भी पत्ती को छूकर पूरा संग्रह किताब की तरह पलटें।
वो चिलचिलाती धूप में साया करती छाँव, या भीगते बदन को पनाह देती छाजन.. उन तमाम ऋतु में आशियाना देती बेझिझक
देखा है आँखों में, तुमको गुमशुदा उस पहली झलक से ही जब पड़ी थी नज़र तुम पर,
मुझे लगता है एक दिन तुम आओगे बातें करने, मिलने या फिर सवाल पूछने नहीं बस मुझे निहारने, मुझे देखने और उन तमाम रंगों को बिखेरने
मैं अब तक जान ना पाया हूँ, क्यों तुझसे मिलने आया हूँ। तुम मेरे दिल की धड़कन में,
एक उठते बवंडर की तरह मन में हलचल लिए, व्याकुल हृदय पग आगे बढ़ा रहे पर, नयन की हृदयगति थमी है,
विराह वेदना मिटाने को यहाँ बचपन जैसा कोई नहीं, ममत्व की छवि मिले
रुकना थोड़ा सा, जी भर कर देख लूँ तुम्हें तुम्हें बुरा न लगे तो थोड़ी आँखें सेक लूँ मैं, बात यह तो काफ़ी पुरानी हो गई है
/ प्रकाशित · in print
कुछ रचनाएँ पत्रिकाओं में भी छपी हैं। यह रही जिस्म — साहित्यिक पत्रिका अनहद कृति (अंक २७) में प्रकाशित, सीधे वहीं से।
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/ परिचय
मैं कीर्तिका — ग्रेटर नोएडा की एक कवयित्री। न कोई मंच, न कोई शोर; बस जब मन भर आता है, तो कलम खुद-ब-खुद कुछ लिख देती है।
मेरी कविताएँ हिंदी की शास्त्रीय भाषा और आज के मन के बीच कहीं रहती हैं — कहीं विरह है, कहीं वैराग्य, कहीं वो प्रतीक्षा जो बरसों से आँखों में सजी है। सब कुछ दिल की सुनकर लिखा गया।
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बिखरी हुई पंक्तियाँ अब एक जिल्द में। कीचड़ में कमल — कीर्तिका की चुनिंदा रचनाओं का पहला संग्रह, प्रिंट और ई-बुक दोनों में। अभी नाम दर्ज कराएँ, पहली प्रति आप तक सबसे पहले पहुँचेगी।
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